मेरे वजूद का मुझ में ज़रा मक़ाम रेहने दो
खामोशियों में रवाँ दर्द का अंजाम रेहने दो
न मिली जो मेहफ़िलें तो क्या करता मैं ऐ जुल्फी
मेरे हिस्से वो अंधेरी तन्हा शाम रेहने दो
मोहब्बतके फ़सानों में इक मेरा फ़साना ग़लत निकला
जहाँ बसती थी ज़िंदगी मेरी वो आशियाना ग़लत निकला
बेहिसाब दिल्लगीके जो उनके सारे क़िस्से थे सही हैं मगर
मेरा तो बस ऐ जुल्फी सिर्फ़ उनसे दिल लगाना ग़लत निकला
तन्हा रातों मे खुश्कियोंको सवारा करते हैं
मोहब्बत मे बेताब दिलको यादोंका सहारा करते हैं
ज़िक्र न तेरा न तेरी बेवफ़ाईका शामिल बयान होता है
हम तो बस अपने दर्दको कागज़ पे उतारा करते हैं