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Saturday, April 29, 2017

मोहब्बत की मेहफ़िल

कभी दिल मे मेरे तु झाँका तो कर
मोहब्बत की मेहफ़िल सजाई है
कभी दिल मे मेरे तु झाँका तो कर
मोहब्बत की मेहफ़िल सजाई है
तुझ ही से तो मेहफ़िल ये रौशन रहे
कि शमा भी तो तेरी जलाई है
कभी दिल मे मेरे तु झाँका तो कर
मोहब्बत की मेहफ़िल सजाई है

ख़ुबसूरत बनाया तुझे इस क़दर
कि आसमां के सितारों को ग़ुमराह किया
तुझे देखकर वो सोच मे पड गए
कि मुक़म्मल ये चाँद किसने अग़वा किया
ये ज़ुल्फ़ों कि काली घटाएं जो हैं
इन्ही ने क़हर दिल पे ढाई है
तुझ ही से तो मेहफ़िल ये रौशन रहे
कि शमा भी तो तेरी जलाई है
कभी दिल मे मेरे तु झाँका तो कर
मोहब्बत की मेहफ़िल सजाई है

ये हुस्न तुम्हारा ग़ज़ब ढा रहा
ग़ुज़रता नही वक़्त अब ग़ुज़ारे हुए
जो पर्दानशीं तुम कभी हो गए
तो बेपर्दा नज़र के नज़ारे हुए
इन क़ातिल तुम्हारी निग़ाहों ने ही
आग ईश्क़ कि दिल मे लगाई है
तुझ ही से तो मेहफ़िल ये रौशन रहे
कि शमा भी तो तेरी जलाई है
कभी दिल मे मेरे तु झाँका तो कर
मोहब्बत की मेहफ़िल सजाई है

हम बैठे थे यारों की मेहफ़िल मे ही
ज़हन मे बस तेरे ख़यालात थे
युं बातों मे ज़िक़्र तेरा हो गया
फ़िर निग़ाहों मे सब के सवालात थे
अब जुल्फी की कोई तमन्ना नही
बस तुझे अपनी ख़्वाहिश बनाई है
तुझ ही से तो मेहफ़िल ये रौशन रहे
कि शमा भी तो तेरी जलाई है
कभी दिल मे मेरे तु झाँका तो कर
मोहब्बत की मेहफ़िल सजाई है

Saturday, April 22, 2017

दौलत ए जुल्फी

कोई चाँद समझ लेता है कोई आफ़ताब समझ लेता है
कोई अपनी निग़ाहों मे बसा ख़्वाब समझ लेता है
तु वो दौलत है बेशक़िमती ऐ हसीं
जिसे पा करके जुल्फी ख़ुद को नवाब समझ लेता है