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Saturday, April 28, 2018

मेरे हिस्से की शाम

मेरे वजूद का मुझ में ज़रा मक़ाम रेहने दो
खामोशियों में रवाँ दर्द का अंजाम रेहने दो
न मिली जो मेहफ़िलें तो क्या करता मैं ऐ जुल्फी
मेरे हिस्से वो अंधेरी तन्हा शाम रेहने दो

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