मोहब्बत की राहों मे चलते चलते काँटों का आशियाना मिला,
हम समझते रहे जिसे अपना दरअसल वही बेगाना मिला.
हम ने अपना दिल दिया था उसे इस क़दर ऐतबार था उस पर,
उम्मीद ए वफ़ा थी जिस से उसी से दर्द का फ़साना मिला.
वो झूठे वादे थे जिसके मोहब्बत दिखावे की थी,
उस बेवफ़ा सनम का तो किसी और के साथ याराना मिला.
न कुछ पाना था और न इश्क़ से ज़्यादा कुछ चाहते थे,
माँगा जो इश्क़ तो बदले मे बेवफ़ाई का नज़राना मिला.
ढूँढते थे हम जिस मुजरिम को दुनिया की भीड़ मे,
उस क़ातिल ए इश्क़ का हमारी निगाहों मे ही ठिकाना मिला.
वो लाख कर ले कोशिश मगर हमे भूला न पाएगा,
याद रहेगा उसे कि बेन्तेहा चाहने वाला एक दीवाना मिला.
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